लालू के लाल के साथ क्‍या कांग्रेस दोहरा पाएगी अपना पिछला प्रदर्शन


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BIHAR DESK : कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है. जो आज साथ हैं कल विरोधी हो सकते हैं और जो कल तक धुर विरोधी थे वे कभी भी साथ आ सकते हैं. बिहार की राजनीति में महागठबंधन का हिस्‍सा बनकर कांग्रेस, मंडल राजनीति से पहले के दौर जैसी मजबूत स्थिति में लौटने के लिए कसमसा रही है. 2015 में 41 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीत लेने से उसके हौसले बुलंद हैं.

राजनीति का यह संयोग भी दिलचस्‍प है कि मंडल राजनीति केे जिस दौर मेें प्रदेश से कांग्रेस का सफाया हो गया था, उस दौर के नायक रहे लालू यादव के बेटे तेजस्‍वी यादव ने ही आज महागठबंधन की कमान सम्‍भाल रखी है. अब देखना ये है कि लालू के लाल का समर्थन पाकर कांग्रेस अपना पिछला प्रदर्शन दोहराने में किस हद तक कामयाब हो पाती है.

2015 के चुनाव परिणामों से मिले अनुकूल संकेतों ने पार्टी के रणनीतिकारों को नई उम्‍मीद से भर दिया है. देश की आजादी के बाद के पांच दशकों मेें ज्‍यादातर वक्‍‍‍त तक बिहार पर कांग्रेस ने राज किया. 1952 से 2015 तक बिहार के 23 मुख्‍यमंत्रियों में से 18 कांग्रेेस के हुए. लेकिन 90 के दौर में मंडल की सियासत ने नए सामाजिक समीकरणों की ऐसी बयार बहाई कि सूबे से कांग्रेस का तंबू-कनात उखड़ गया. तबसे आज तक पार्टी कभी सत्‍ता में वापसी नहीं कर पाई.

हालांकि आगे चलकर राममंदिर आंदोलन के साथ भाजपा की बढ़त ने समीकरणों में ऐसा उलट-फेर किया कि बिहार में कांग्रेस विरोध और मंडल सियासत की बयार बहाने वाले लालू यादव केंद्र में कांग्रेस और यूपीए के सबसे बड़े संकटमोचकों में शुमार हो गए. लालू तबसे यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के हिमायती बने हुए हैं. यहां तक कि बिहार में राजद और कांग्रेस के गठबंधन को अब प्राकृतिक और स्‍वाभाविक गठबंधन की संज्ञा दी जाने लगी है.

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